श्रेणी: धार्मिक

कई बार धरती पर नजर आ चुके हैं ये रहस्यमयी जीव, लोग नहीं भूल पाए इनका चेहरा

दुनिया में कई तरह के रहस्य, कहानियां हैं जिन्हें आज तक कोई सुलझा नहीं पाया है। कुछ को अफवाहें मान कर भुला दिया गया तो कुछ समय के साथ बदलती गईं। जलपरियां, वैम्पायर्स, वॉल्वरीन, यूएफओ जैसी कई अनसुलझी पहेलियां हैं जो वक्त के साथ खबरों में आती रहती हैं। इनसे अलग कुछ ऐसे भी रहस्य हैं जिन्हें आज तक ना ही कोई समझ पाया है और ना ही सुलझा पाया है।

बिगफुट

अमेरिका के 26वें राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने अपनी किताब ‘दी वाइल्डरनेस हंटर’ में जिक्र किया है कि एक हंटिंग ट्रिप के दौरान उन्हें एक आदमी मिला था जिसने उन्हें एक कहानी सुनाई थी। उस आदमी का कहना था कि जंगल में एक बीस्ट घूम रहा है जिसने उसके दोस्त की हत्या कर दी थी। हालांकि ये कोई पहला मामला नहीं है, कई लोगों ने इस बीस्ट को देखने का दावा किया है।

लॉच नेस मॉन्सटर
स्कॉटलैंड की झील लॉच नेस में एक रहस्मयी जीव को देखा जाता है। कहा जाता है कि यह बात 1500 साल से भी पुरानी है लेकिन 1993 के बाद से इसको ज्यादा देखा गया। 1933 में जॉन मैकेय और उनकी पत्नी ने झील में एक जीव देखने की बात कही थी जो काफी खतरनाक दिखता था।

चुपाकाबरा

चुपाकाबरा की कहानियां मेक्सिको और टेक्सस में काफी प्रसिद्ध हैं। चुपाकाबरा 4 से 5 इंच के एक जीव को कहा जाता है जिसके पैर बहुत मजबूत और आंखें एकदम लाल हैं। लैटिन अमेरिकन्स मानते हैं कि यह अमेरिकी सरकार के प्रयोगों का असर है जो वह उनके जंगलों में कर रही है।

दी जर्सी डेविल
न्यू जर्सी में जर्सी डेविल का खौफ कभी इस कदर था कि स्कूल तक बंद हो गए थे और लोग दुबक कर अपने-अपने घरों में छुप गए थे। लोगों का कहना है कि एक वक्त उन्होंने यहां एक कंगारू जैसे दिखने वाले जीव को देखा था जो उड़ भी सकता था।

मॉथमैन

वेस्ट वर्जिनिया में खुदाई करते वक्त कुछ लोगों ने अपने ऊपर एक आदमी को उड़ता हुआ देखा जिसके काफी बड़े पंख थे और आंखें एकदम सुर्ख लाल। वहां के लोगों ने लगभग एक साल तक इस जीव को देखा। 1957 में ‘दी मॉथमैन प्रोफेसिस’ नाम की एक किताब भी आई थी जिसपर रिचर्ड गेयर की फिल्म आधारित है।

मृत्यु से पहले मनुष्य को मिलते है ये संकेत..


नई दिल्ली। दुनिया में कई बातें ऐसी है जो आज भी रहस्य हैं और संभवतः ये रहस्य ही बनी रहेगीं। विज्ञान के पास इन बातों का कोई प्रमाणिक उत्तर नहीं है। ये बातें सदियों से एक अनसुलझी पहेली हैं। इन्हीं में से एक है मृत्यु लेकिन हिंदू धर्म ग्रंथ शिव महापुराण में ऐसी कई बातों का उल्लेख मिलता है, जिनसे मृत्यु आने के पहले मृत्यु का संकेत मिलता है।

शिव पर गिद्ध, कौवा: शिवपुराण में भगवान शिव ने बताया है कि मनुष्य के सिर पर यदि गिद्ध, कौवा अथवा कबूतर आकर बैठ जाए, वह एक महीने के भीतर ही मर जाता है।

त्रिदोष में नाक बहना: त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) में जिसकी नाक बहने लगे, उसका जीवन पंद्रह दिन से अधिक नहीं चलता है।

जल में परछाई न दिखना: जब किसी व्यक्ति को जल, तेल, घी और दर्पण में अपनी परछाई न दिखाई दे, तो समझना चाहिए कि उसकी आयु 6 माह से अधिक नहीं है।

बायां हाथ का फड़कना: जब किसी मनुष्य का बायां हाथ लगातार एक सप्ताह तक फड़कता ही रहे, तब उसका जीवन एक मास ही शेष रहता है।

चन्द्रमा का काला दिखना: यदि किसी व्यक्ति को चंद्रमा और सूर्य काले दिखाई देने लगते हैं और संपूर्ण दिशाएं जिसे घूमती दिखाई देती हैं, उसकी मृत्यु 6 महीने के अंदर हो जाती है।

भारत में भी है चाइना जैसी ‘द ग्रेट वॉल’, 80 KM लम्बी है 1000 साल पुरानी दीवार


भोपाल से 200 किमी दूर गोरखपुर गांव में करीब 1000 साल पुरानी दीवार के अवशेष मिले हैं। आर्कियोलॉजिस्ट्स का दावा है कि ये भारत की सबसे लम्बी और प्राचीन दीवार है। 10 वीं से 11 वीं सदी के बीच बनी ये दीवार मध्य प्रदेश के रायसेन डिस्ट्रिक्ट में है। वर्ल्ड हैरिटेज वीक(19 से 25 नवंबर)के दौरान dainikbhaskar.com की टीम ने इस जगह का मुआयना किया तो कई हैरान करने वाली बातें सामने आई।कितनी है दीवार की लम्बाई…
 

– इस दीवार की लम्बाई 80 किमी से भी ज्यादा है,जो उदयपुरा(रायसेन जिला)के गोरखपुर गांव से सटे जंगल से शुरू होती है और भोपाल से 100 किमी दूर बाड़ी बरेली(चौकीगढ़ किले)तक जाती है।

-आर्किलोजिस्ट डॉ.नारायण व्यास के मुताबिक,विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की पहाड़ियों पर घने जंगलों के बीच 10 वीं से 11 वीं सदी के बीच परमार कालीन राजाओं ने इसे बनवाया होगा। इसकी बनावट से यह प्रतीत होता है कि संभवतः दीवार परमार कालीन राज्य(टाउनशिप)की सुरक्षा दीवार रही होगी।

-यह कई जगह से टूटी है,फिर भी इसकी ऊंचाई 15 से 18 फीट और चौड़ाई 10 से 15 फीट है। कुछ जगह इसकी चौड़ाई 24 फीट तक है। 

 

 

क्यों बनवाई गई होगी दीवार…

 

डॉ.नारायण व्यास के मुताबिक,परमार वंश के राजाओं ने यह दीवार अपने राज्य की सुरक्षा के लिए बनवाई होगी। गोरखपुर गांव से आगे नरसिंहपुर और जबलपुर पड़ता है,जो 10-11 वीं सदी में कल्चुरी शासकों के अंतर्गत आता था। बता दें कि परमार और कल्चुरी शासकों में आपस में युद्ध हुआ करते थे। कल्चुरी शासकों के हमलों से बचने के लिए ही शायद इतनी ऊंची दीवार बनाई गई हो। गौरतलब है कि दूसरी शताब्दी में चीन के पहले सम्राट किन शी हुआंग ने भी चीन की दीवार का निर्माण विदेशी हमलों से मिंग वंश को बचाने के लिए किया था। 

 

कैसी है दीवार की बनावट…

 

-दीवार को बनाने में लाल बलुआ पत्थर की बड़ी चट्टानों का इस्तेमाल किया है। इसके दोनों ओर विशाल चोकोर पत्थर लगाए गए हैं। 

-हर पत्थर में त्रिकोण आकार के गहरे खांचे बने हुए हैं,जिनसे पत्थरों की इंटरलॉकिंग की गई है। इसलिए जुड़ाई में चूना,गारा आदि का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

-हालांकि,दीवार के बीच में पत्थर के टुकड़े,मिट्टी और कंकड़ का भराव किया गया है।

-कहीं-कहीं पत्थरों को जोड़ने के लिए लोहे के डावेल्स का भी इस्तेमाल किया गया है।

-गोरखपुर से 8 किमी(रोड़ रूट)दूर मोघा डैम पर इस दीवार का काफी हिस्सा सुरक्षित है। 

कई मंदिर और मूर्तियां भी हैं मौजूद
– इस दीवार के आस-पास भगवान शिव, विष्णु, भैरव और सूर्य के मंदिर मिले हैं, जो पंचायतन शैली में बने हुए हैं। 

– इसके अलावा 10-11 वीं सदी की कई बावड़ीयां, तालाब, मंदिर, तहखाने भी मिले हैं, जो या तो जमींदोज हो चुके हैं या उनपर आज घना जंगल खड़ा है।  

– गोरखपुर गांव के पास एक विशाल 500×500 फीट का सीढ़ीनुमा पक्के घाटों वाला तालाब मौजूद है। 

इसे बनाने में लम्बे बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। इसके चारों ओर तट पर मंदिरों के अवशेष आज भी मौजूद हैं।  

मोघा डैम पर मौजूद है सबसे भव्य रूप

 

– गोरखपुर गांव के पास मोघा डैम पर दीवार का सबसे भव्य रूप दिखाई देता है। यहां दीवार 3×2 फीट की बड़ी चट्टानों से बनाई गई है।

– यहां दीवार के बाहरी ओर के हिस्से को तराशकर चिकना बनाया गया है। दीवार पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बुर्ज भी मौजूद हैं, जो बाहरी हिस्से की निगरानी के काम में आते हैं।

– दीवार के सहारे लगे कुछ परकोटे मिले हैं जिनके अन्दर सांची के स्तूप में पाए गए बौद्ध विहारों की तरह घरों के अवशेष भी मिले हैं, जो सैकड़ों की संख्या में हैं।

कौन- कौन सी बेशकीमती मूर्तियां हैं यहां

 

–  यहां परमार काल की भगवान शिव, गणेश, भैरव, लक्ष्मी नारायण(हरे पत्थर की मूर्ति), सूर्य देवता की एक हजार साल पुरानी बेशकीमती मूर्तियां मिली हैं।

–  गोरखपुर गांव के पास जहां से इस दीवार की शुरुआत होती है वहां एक सूर्य देवता का मंदिर भी है, जिसे स्थानीय लोग मां काली का रूप मानकर पूजते हैं। इस मूर्ति के ठीक नीचे पांच घोड़े भी बने हुए हैं।

– इसके अलावा हाथियों की प्रतिमा, सती की मूर्तियां भी यहां मिली हैं।  

– मध्य भारत इतिहास संकलन समिति के विनोद तिवारी ने बताया कि इस साइट से अब तक कई मूर्तियां चोरी जा चुकी हैं। हाल ही में यहां से एक भैरव की आदमकद दुर्लभ मूर्ति (तकरीबन 8 फीट) भी चोरी हो चुकी है, जिसके 20 हाथ थे।

राजकीय आवास भी हैं मौजूद

मंदिरों के अलावा यहां राजकीय आवास के करीब 25 फीट ऊंचे अवशेष मिले हैं, जो पश्चिम दिशा में 150×150 फीट के चबूतरे पर बने हुए हैं। इन चबूतरों की सीढ़ियां पूर्व दिशा में है। इसके अलावा हर मंदिर और आवासों के पास हौज और बावड़ियां भी मौजूद हैं।  

 

दीवार के स्टार्टिंग प्वाइंट से पहले 500*500 फीट लंबा-चौड़ा तालाब है। इसे बनाने में बड़े पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है।।

ये दीवार रायसेन के जंगल में फैली हुई है। इसे चालुक्य शासकों के हमले से बचने के लिए बनाया गया होगा।

जंगल में कई जगह तहखानों के स्ट्रक्चर भी हैं। इन्हें पत्थर की बड़ी स्लैब से ढंका गया है।
कई जगहों पर दीवार टूटी हुई है। इन पत्थरों को चुराया भी जा रहा है।
कई किलोमीटर एरिया में ऐतिहासिक संरचनाएं और नक्काशीदार पत्थर बिखरे हुए हैं।

यहां से हरे पत्थर की लक्ष्मी-नारायण की मूर्ति भी मिली है। इसे नजदीक के मंदिर में संभालकर रखा गया है।

यकीन मानिये, अब तक आपने इतना खुबसूरत सांप कभी नहीं देखा होगा!


लखनऊ. सांप  ऐसा जीव है जिसे देखने के बाद लोगों को भय हो ही जाता है, भले ही साँप जहरीला हो या ना हो. कुछ लोग होते हैं जिन्हें साँपों से बड़ा प्रेम होता है और इसी प्रेम के वशीभूत होकर वह साँपों के ऊपर शोध करते हैं और साँप को पालते हैं. आपने अपने जीवन में बहुत तरह के साँप देखें होंगे, लेकिन हम जिस साँप की बात कर रहे हैं, वह अत्यंत ही दुर्लभ साँप है, जिसे बहुत कम लोगों ने ही देखा होगा.

खूबसूरती देखने लायक

यकीन मानिये इतना खुबसूरत साँप आपने आज से पहले नहीं देखा होगा. यह साँप इतना सुन्दर है कि आप यह भूल जायेंगे कि साँप में जहर भी होता है. बस आप चाहेंगे कि हर समय इसी को देखते रहा जाये. इसकी खूबसूरती देखने के बाद आप दुनियाँ की अन्य खुबसूरती को भूल जायेंगे और प्रकृति की रचनाओं के ऊपर आपको आश्चर्य होने लगेगा. यह साँप बहुत ही दुर्लभ प्रजाति का है, बहुत ही कम जगहों पर देखा जाता है.

इस साँप को पहली बार उत्तर प्रदेश में देखा गया था. अभी हाल ही में इस साँप को दूसरी बार उत्तराखंड में देखा गया है. आपको बता दें इस साँप को लाल मूंगा खुखरी साँप कहा जाता है. इस साँप को लाल मूंगा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका रंग बिलकुल लाल मुंगे की तरह ही चमकदार है. अगर वन विभाग के दावे की बात करें तो उनके अनुसार अभी इस लाल मूंगा खुखरी साँप से दुनियाँ पूरी तरह से अंजान है.

वैज्ञानिक नाम ओलिगोडॉन खीरीएसिस

इस साँप को आज से बहुत पहले 1936 में पहली बार लखीमपुर खीरी में देखा गया था, उसके बाद यह गायब हो गया था. इस अद्भुत साँप का वैज्ञानिक नाम ओलिगोडॉन खीरीएसिस रखा गया है. यह साँप उत्तराखंड में 2014 में एक सड़क किनारे किसी गाड़ी से कुचला हुआ मिला था, इसलिए इस साँप के ऊपर किसी भी प्रकार की शोध नहीं की जा सकी थी.

जीव  विशेषज्ञ विपुल मौर्य जो पूर्वी तराई वन प्रभाग में सरीसृपों के ऊपर अध्ययन करते हैं और सरीसृप विशेषज्ञ जयप्रताप सिंह ने इस दुर्लभ साँप को आख़िरकार पकड़ ही लिया है. संयोग से दुबारा यह साँप जिन्दा सुरई रेंज में मिला था. अभी विशेषज्ञों की एक टीम इस साँप के ऊपर शोध कार्य कर रही है. जयप्रताप सिंह ने बताया है कि फिलहाल हम इसके रहन-सहन, वासस्थल और हावभाव के ऊपर नजर रख रहे हैं, जिससे यह पता चल सके कि इस दुर्लभ साँप की प्रजाति को विकसित किया जा सकता है की,  नहीं?